दार्शनिक प्रशांत ने एमआईएस की छात्राओं के साथ किया संवाद ।

मसूरी। विश्व के प्रतिष्ठित दार्शनिक व लेखक आचार्य प्रशांत का मसूरी इंटर नेशनल स्कूल में पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। इस मौके पर प्रधानाचार्या शालू बब्बर ने उन्हें बुके व शॉल भेंट कर सम्मानित किया। इस मौके पर उन्होंने विद्यालय की जूनियर व सीनियर छात्राओं के साथ विशेष संवाद सत्र में प्रतिभाग किया व उनके सवालों के संतोष जनक व प्रेरणादायक उत्तर दिए। उन्होने कहा कि जीवन में परिणाम नहीं, बल्कि ईमानदारी ज़रूरी है।
मसूरी इंटरनेशनल स्कूल की छात्राओं से विद्यालय के सभागार में आचार्य प्रशांत ने सीधा संवाद किया। जिसमें छात्राओं के साथ गहन और विचारोत्तेजक चर्चा हुई। यह सत्र न केवल अकादमिक प्रश्नों तक सीमित रहा बल्कि पहचान, आत्म-बोध, सफलता के दबाव और शिक्षा के वास्तविक अर्थ जैसे महत्वपूर्ण विषयों को भी केंद्र में लेकर चला। देशभर में युवाओं और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जिसमें आईआईटी, आईआईएम, एआईआईएमएस में अपने संवादों के लिए चर्चित आचार्य प्रशांत के इस सत्र में भी वही ऊर्जा और सहभागिता देखने को मिली। छात्राओं ने खुलकर प्रश्न पूछे और पूरे सत्र में सक्रिय भागीदारी दिखाई, जिससे यह एक जीवंत संवाद का रूप ले सका। पहचान और आत्म-आलोचना से जुड़े एक प्रश्न पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि आत्म-ज्ञान के अभाव में व्यक्ति अपनी पहचान के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है।

उन्होंने विद्यालयों में आत्म-ज्ञान को आवश्यक बताते हुए कहा कि जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता, तब तक वह बाहरी मान्यताओं पर निर्भर रहेगा। शैक्षणिक दबाव और परिणामों को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति का नियंत्रण केवल अपने प्रयास, नीयत और ईमानदारी पर होता है, परिणामों पर नहीं। उन्होंने भगवदगीता के सिद्धांत ‘मा फलेषु कदाचन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि अच्छे अभिभावक और शिक्षक वही हैं जो बच्चों से केवल ईमानदारी और प्रेम की अपेक्षा रखें न कि निश्चित परिणामों की। उन्होंने छात्राओं को अपने अध्ययन से प्रेम करने और उसे समझने पर बल दिया। स्मरण शक्ति से जुड़े प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि मस्तिष्क वही याद रखता है जिसे हम महत्व देते हैं और जिससे हमारा लगाव होता है। इसलिए पढ़ाई को बोझ न मानकर उससे जुड़ाव विकसित करना आवश्यक है। शिक्षा और आध्यात्म के संबंध पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आध्यात्म अलग विषय नहीं बल्कि शिक्षा का ही अभिन्न अंग है। उन्होंने विद्या और अविद्या के संतुलन को पूर्ण शिक्षा बताया जहाँ बाहरी ज्ञान के साथ साथ स्वयं को जानने की प्रक्रिया भी शामिल हो। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बोलते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका अचेत और अज्ञान उपयोगकर्ता ही वास्तविक समस्या है। यदि उपयोगकर्ता इतना सजग हो कि वह इसके दुष्प्रभावों जैसे जलवायु संकट में इसके योगदान को समझ सके, तो वही तकनीक मानवता के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। पहचान और कर्तव्यों पर चर्चा करते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि अधिकांश कर्तव्य हमारी अपनाई हुई पहचानों से उत्पन्न होते हैं, जबकि सच्ची जिम्मेदारी समझ और प्रेम से आती है। उन्होंने छात्राओं को स्वयं से यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया व कहा कि पहले अपने को समझो कि मैं कौन हूं। विविधता के विषय में उन्होंने कहा कि भले ही बाहरी रूप से हम अलग-अलग हों  पर हमारी चेतना हमें एक करती है यही सबसे महत्वपूर्ण सत्य है। सत्र के दौरान आचार्य प्रशांत ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन में उत्कृष्टता का अर्थ है कभी भी अधूरेपन से संतुष्ट न होना और स्वयं के प्रति पूरी ईमानदारी बनाए रखना। यह संवाद केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं रहा बल्कि आत्ममंथन और आंतरिक स्पष्टता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा, जिसमें छात्राएं अपने जीवन से जुड़े गहरे प्रश्नों के साथ लौटीं। इस मौके पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि मै विद्यालय में आकर अभीभूत हूं, जहां छात्राओं में ईमानदारी व जिज्ञासा देखी, छात्राओं के सवाल हृदयस्पर्शी व विचारात्मक थे। छात्राओं के प्रश्न गहरे थे ,प्रतिप्रश्न थे और मान भी नहीं रहे थे जबतक समझ न सके, संवाद गहरा व सुंदर था।उन्होंने युवाओं को संदेश दिया व कहा कि पहले शिकायत करते थे कि दुनिया, समाज व परंपरा ने दबा रखा है, दमनकारी व्यवस्थायें थी जिसमें विद्रोह भी होता था लेकिन आज की पीढी का काम दोहरा है, जो बाहर ठीक नहीं है झूठा, फरेब है उसे नहीं मानते व ठुकरा देते है लेकिन जो मन के अंदर बैठा है उसे  नहीं ठुकरा पाते, अंधविश्वास, अज्ञान, गलत मान्यताएं, पूर्वाग्रह है जो हमारा दुश्मन है उसे भी ठुकराओ तभी आगे बढ सकेंगे। इस मौके पर विद्यालय के चेयरमैन शांतनु, प्रधानाचार्या शालू बब्बर सहित शिक्षक, शिक्षिकाए व छात्राएं मौजूद रही।