मसूरी:- आर्यम इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन के तत्त्वावधान में संचालित भगवान शंकर आश्रम ने श्रावण मास की शिवरात्रि के उपलक्ष्य में आर्यम शिव महोत्सव का आयोजन किया। दो सत्रों में बँटे इस महोत्सव में रुद्री पाठ के मंत्रों से रुद्र अभिषेकम् एवं अग्निहोत्रम आयोजित हुआ। शिव की भक्ति में लीन विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालुओं ने इस अनुपम एवं दिव्य आराधना में भाग लिया। समस्त कार्यक्रम परमपूज्य जगद्गुरु प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी महाराज के सानिध्य में संचालित हुआ।
शिवरात्रि का पर्व हमारे देश में सभी भक्तगणों के लिए अत्यंत श्रद्धा और उत्सवधर्मिता का पर्व है। इस दिन महादेव शिव की पूजा अर्चना करने के विशेष लाभ बतलाए गए हैं। आर्यम जी महाराज ने दर्शाया कि किस तरह शिव शांति, सौहार्द एवं दया के प्रतीक हैं। इसी वजह से भोले शब्द का एक अर्थ भगवान शिव भी हैं। मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक लोटा जल भी पर्याप्त है इसी लिए उन्हें आशुतोष भी कहते हैं। जो कैलाश पर्वत की तरह स्थिर और अपनी ही भावदशा में संतुलित हों फिर उनके अभिषेक की आखिर क्या आवश्यकता है। इस शंका को दूर करते हुए गुरुदेव आर्यम ने बतलाया कि शिव के अत्यंत सौम्य और प्रशांत होने के कारण ही वे अपने प्रचंड तांडव से समस्त ब्रह्मांड का विनाश करने की क्षमता रखते हैं और उनके इस रौद्र स्वरूप को जिस किसी ने परीक्षण किया तो उसने फिर या तो मृत्यु के दर्शन किए या फिर नवीन जीवन के। गुरुदेव आर्यम के सानिध्य में रुद्र अभिषेकम में पंचामृत दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और शक्कर आदि असंख्य औषिधियों, जड़ी बूटियों और पदार्थों से शिव लिंगम का अभिषेक किया गया। भगवान शिव को स्नान कराने से मनुष्य स्वयं के क्लेशों, पापों, दुर्विचारों, एवं आगामी दुर्गतियों से सुरक्षित करता है। महोत्सव के दूसरे सत्र में रुद्र अष्टाध्यायी के मन्त्रों से विशेष अग्निहोत्रम किया गया। भगवान शिव को चढ़ाई हर आहुति हमारे जीवन से नकारात्मकता को घटाती है और शुभता को लाती है। ऋग्वेद के मन्त्र इस बात की पुष्टि करते हैं किस तरह परमात्मा को अपने जीवन के कुछ अंश चढ़ाकर हम अपने आरोग्य, विवेक और सम्पूर्ण जीवन को श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर रख पाते हैं। आर्यम जी महाराज ने इस बात पर संकेत किया कि हमें पाखंड और आडंबर के मार्गों से बचना है। जहाँ शिव के नाम पर बुरे आचरण और आदतों का प्रसार हो रहा है वहाँ सच्चे सनातनी को सही विधि का, विचार का, एवं गुणों का प्रसार करना चाहिए। ट्रस्ट की अधिशासी प्रवक्ता माँ यामिनी श्री ने बताया कि समस्त विश्व में आर्यम जी महाराज ही हैं जो सनातन धर्म के प्राचीनतम विधियों को नए रूप से प्रदर्शित एवं प्रसारित कर रहे हैं। इस अवसर पर सभी भक्त श्वेत परिधान में सम्मिलित हुए। ज्ञातव्य रहे कि आर्यम प्रकल्प से ना केवल भारत के लोग जुड़े हैं बल्कि असंख्य देशों से लोग आर्यम गुरुदेव के दिखाए मार्ग पर प्रशस्त हैं। सभी श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए श्री आर्यम गुरुदेव ने बतलाया कि अपने जीवन को संतुलित बनाए रखने के लिए भारत को उसके असल पर्वों को और अधिक उत्सवधर्मिता के संग जुड़ना होगा। भगवान शिव देवों के देव हैं, वह स्वामित्व की परम मूरत हैं, गुरुदेव ने सभी भक्तों यही सूत्र दिया कि हम तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु का सूत्र विद्यमान करें और जीवन में विजयी बनें।
शिवरात्रि का पर्व हमारे देश में सभी भक्तगणों के लिए अत्यंत श्रद्धा और उत्सवधर्मिता का पर्व है। इस दिन महादेव शिव की पूजा अर्चना करने के विशेष लाभ बतलाए गए हैं। आर्यम जी महाराज ने दर्शाया कि किस तरह शिव शांति, सौहार्द एवं दया के प्रतीक हैं। इसी वजह से भोले शब्द का एक अर्थ भगवान शिव भी हैं। मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक लोटा जल भी पर्याप्त है इसी लिए उन्हें आशुतोष भी कहते हैं। जो कैलाश पर्वत की तरह स्थिर और अपनी ही भावदशा में संतुलित हों फिर उनके अभिषेक की आखिर क्या आवश्यकता है। इस शंका को दूर करते हुए गुरुदेव आर्यम ने बतलाया कि शिव के अत्यंत सौम्य और प्रशांत होने के कारण ही वे अपने प्रचंड तांडव से समस्त ब्रह्मांड का विनाश करने की क्षमता रखते हैं और उनके इस रौद्र स्वरूप को जिस किसी ने परीक्षण किया तो उसने फिर या तो मृत्यु के दर्शन किए या फिर नवीन जीवन के। गुरुदेव आर्यम के सानिध्य में रुद्र अभिषेकम में पंचामृत दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और शक्कर आदि असंख्य औषिधियों, जड़ी बूटियों और पदार्थों से शिव लिंगम का अभिषेक किया गया। भगवान शिव को स्नान कराने से मनुष्य स्वयं के क्लेशों, पापों, दुर्विचारों, एवं आगामी दुर्गतियों से सुरक्षित करता है। महोत्सव के दूसरे सत्र में रुद्र अष्टाध्यायी के मन्त्रों से विशेष अग्निहोत्रम किया गया। भगवान शिव को चढ़ाई हर आहुति हमारे जीवन से नकारात्मकता को घटाती है और शुभता को लाती है। ऋग्वेद के मन्त्र इस बात की पुष्टि करते हैं किस तरह परमात्मा को अपने जीवन के कुछ अंश चढ़ाकर हम अपने आरोग्य, विवेक और सम्पूर्ण जीवन को श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर रख पाते हैं। आर्यम जी महाराज ने इस बात पर संकेत किया कि हमें पाखंड और आडंबर के मार्गों से बचना है। जहाँ शिव के नाम पर बुरे आचरण और आदतों का प्रसार हो रहा है वहाँ सच्चे सनातनी को सही विधि का, विचार का, एवं गुणों का प्रसार करना चाहिए। ट्रस्ट की अधिशासी प्रवक्ता माँ यामिनी श्री ने बताया कि समस्त विश्व में आर्यम जी महाराज ही हैं जो सनातन धर्म के प्राचीनतम विधियों को नए रूप से प्रदर्शित एवं प्रसारित कर रहे हैं। इस अवसर पर सभी भक्त श्वेत परिधान में सम्मिलित हुए। ज्ञातव्य रहे कि आर्यम प्रकल्प से ना केवल भारत के लोग जुड़े हैं बल्कि असंख्य देशों से लोग आर्यम गुरुदेव के दिखाए मार्ग पर प्रशस्त हैं। सभी श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए श्री आर्यम गुरुदेव ने बतलाया कि अपने जीवन को संतुलित बनाए रखने के लिए भारत को उसके असल पर्वों को और अधिक उत्सवधर्मिता के संग जुड़ना होगा। भगवान शिव देवों के देव हैं, वह स्वामित्व की परम मूरत हैं, गुरुदेव ने सभी भक्तों यही सूत्र दिया कि हम तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु का सूत्र विद्यमान करें और जीवन में विजयी बनें।

