मसूरी। मसूरी निवासी पूर्व डीआईजी आईटीबीपी व हिमालयन एडवेंचर इंस्टिट्यूटकैपंटी मसूरी के निदेशक शिव प्रसाद चमोली को तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड के लिए चुना गया। यह भारत का सबसे बड़ा एडवेंचर सम्मान है, जिसका दर्जा अर्जुन अवॉर्ड के बराबर माना जाता है। 84 साल की उम्र में भी पर्वतारोहण, रिवर राफ्टिंग, स्कीइंग और आपदा-प्रबंधन ट्रेनिंग में सक्रिय; हिमालयन एडवेंचर इंस्टीटयूट के संस्थापक को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित करने के लिए उनका चयन किया जाना उत्तराखंड के लिए गर्व की बात है।
उत्तराखंड और देश के लिए बहुत गर्व का क्षण है कि हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट केम्प्टी फॉल, मसूरी के संस्थापक-निदेशक और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के पूर्व उप महानिरीक्षक शिव प्रसाद चमोली को भारत सरकार के युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट श्रेणी में तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड जीवन पर्यत उपलब्धि के लिए चुना गया है। यह एक ऐसा पुरस्कार है जिसकी प्रतिष्ठा भारत के सर्वाेच्च खेल सम्मान अर्जुन अवॉर्ड के बराबर मानी जाती है। यह सम्मान एसपी चमोली के छह दशकों से अधिक के अथक योगदान को देश की सर्वाेच्च खेल उपलब्धियों में शामिल करता है। यह न केवल उनके लिए, बल्कि मसूरी, पूरे उत्तराखंड और हिमालयन एडवेंचर समुदाय के लिए गर्व की बात है। हिमालय की गोद में बीता जीवन व 1942 में जन्मे एसपी चमोली का एडवेंचर से जुड़ाव एक युवा सेना अधिकारी के रूप में शुरू हुआ और आईटीबीपी में उनके शानदार करियर के दौरान जारी रहा, जहाँ वे उप महानिरीक्षक के पद तक पहुँचे। छह दशकों से अधिक समय में, उन्होंने पर्वतारोहण, स्कीइंग और रिवर राफ्टिंग में कई राष्ट्रीय और विश्व रिकॉर्ड बनाए हैं। 1974 में सबसे मुश्किल और पहले कभी न चढ़ी गई नीलकंठ चोटी (21,640 फीट) पर पहली सफल चढ़ाई का नेतृत्व किया। 1978 भारत के पहले स्कीइंग अभियान के उप-नेता के तौर पर केदार डोम (22,710 फीट) पर चढ़ाई की, जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उनकी सराहना की; 1989 में इटली में हुए वर्ल्ड पुलिस विंटर गेम्स और यूरोपियन स्की चौंपियनशिप में भारत की पहली टीम की कप्तानी भी की। 1981 सर एडमंड हिलेरी की देखरेख में भारत-न्यूज़ीलैंड के संयुक्त हिमालयन ट्रैवर्स अभियान का नेतृत्व किया इसमें कंचनजंगा से काराकोरम तक पूरे हिमालय में 5,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की और 265 दिनों में 106 दर्रों को पार किया । यह आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है। 1986 काराकोरम की सबसे ऊंची बिना चढ़ी हुई चोटी, सासेर कांगरी-तीन 24,695 फ़ीट पर पहली बार चढ़ाई का नेतृत्व किया, और इसके बाद श्योक नदी में 105 किलोमीटर का अभूतपूर्व राफ्टिंग अभियान पूरा किया। संयुक्त भारत जापान ब्रहमपुत्र राफ्टिंग अभियान का नेतृत्व किया व त्सांगपो गॉर्ज और ब्रहमपुत्र नदी में गेलिंग से ध्र्रुबरी तक लगभग 1100 किमी प्रथम सफल राफ्टिंग जो आज भी विश्व रिकार्ड है। 1997 से भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन की राष्ट्रीय स्पोटर्स क्लाइंबिंग समिति के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में देशभर में स्पोटर्स क्लाइंबिग को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी एफ.आर.जी.एस. के फेलो तथा द ग्रेट हिमालयन ट्रैवर्स एवं राफ्टिंग डाउन द मिस्टिक ब्रह्मब्र पुत्र पुस्तकों के लेखक, जिनके अभियानों व लेखों को अमेरिकन अल्पाइन जर्नल, हिमालयन जर्नल तथा राष्ट्री मीडिया में वर्षों तक स्थान मिला। 84 वर्ष की आयु में भी एक सुरक्षित एवं साहसिक भारत के निर्माण में जुटे है। इस सम्मान की विशेषता यह है कि चमोली का साहसिक क्षेत्र में योगदान कभी थमा नहीं। आई.टी.बी.पी. से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने 1994 में केम्पटी फॉल, मसूरी मे हिमालयन एडवेंचर इंस्टीटयूट की स्थापना की और आज 84 वर्ष की आयु मे भी वे स्वयं भारत के भावी साहसिक कर्मियों एवं आपदा प्रतिक्रिया दलों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उनके प्रत्यक्ष नेतृत्व में, एचएआई आज भारत के अग्रणी आउटडोर शिक्षा एवं आपदा-सुसज्जता केंद्रों मे से एक बन चुका है। अभी तक 21,000 से अधिक युवाओं, और छात्रों एवं नागरिकों को पर्वतारोहण, रॉक व स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग, उच्च हिमालयी ट्रेकिंग तथा आउटडोर नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया गया है। उत्तराखंड पुलिस, एन.डी.आर.एफ., होम गार्ड, अग्निशमन सेवा एवं जिला प्रशासन से जुड़े 1,420 से अधिक खोज एवं बचाव कर्मियों को पर्वतीय बचाव व आपदा प्रबंधन मे ंप्रशिक्षित किया गया, जिनमें से अनेक ने बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाओं मे ंजीवन बचाने का कार्य किया। ओ.एन.जी.सी. तथा डिज़ास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर जैसी संस्थाओं के साथ एम्पैनल्ड, तथा हिमालयी पारिस्थितिकी, संस्कृति व विरासत संरक्षण के क्षेत्र मे योगदान हेतु संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है। आई.ए.एस. प्रोबेशनर्स, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, कॉर्पाेरेट टीमों तथा अंर्तराष्ट्रीय संस्थानों हेतु नेतृत्व, टीम निर्माण एवं संकट प्रबंधबं कार्यक्रमों का नियमित आयोजन कर रहे है। आज भी श्री चमोली संस्थान के प्रबंधन और स्वयं टीम बिल्डिंग, नेतृत्व, प्रेरणा एवं आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण सत्र संचालित करने में अपना समय देते है जो उनके सहयोगियों के अनुसार, साहस, सहनशक्ति और सेवा की उसी भावना का जीवंत उदाहरण है, जिसके सम्मान हेतु टेंज़िंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार की स्थापना की गई थी।उनका कहना है कि यह पुरुस्कार जितना मेरा है, उतना ही उत्तराखंड के पर्वतों और नदियों का भी है। मेरी एकमात्र अभिलाषा यही रही है कि हिमालय ने मुझे जो साहस, अनुशासन और सेवा की भावना सिखाई, उसे मैं अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँचा सकूँ जब तक मुझ में सामर्थ्य है। 84 वर्ष की आयु में भी मेरा यही संकल्प है। 1994 मे एस.पी. चमोली द्वारा स्थापित, हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट केम्पटी फॉल, मसूरी स्थित एक पंजीकृत गैर-सरकारी संस्था है, जो आउटडोर शिक्षा, पर्वतारोहण, स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग तथा आपदा प्रबंधबंन हेतु पर्वतीय खोज एवं बचाव प्रशिक्षण के लिए समर्पित है। तीन दशकों मे एचएआई ने हज़ारों युवा ओं, पुलिस व अर्धसैनिक कर्मियों, कॉर्पाेरेट टीमों एवं अंतरराष्ट्रीय अतिथियों को प्रशिक्षित किया है, तथा यह साहसिक-आधारित नेतृत्व एवं आपदा-सुसज्जता प्रशिक्षण के क्षेत्र में भारत के अग्रणी केंद्रों में गिना जाता है।
उत्तराखंड और देश के लिए बहुत गर्व का क्षण है कि हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट केम्प्टी फॉल, मसूरी के संस्थापक-निदेशक और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के पूर्व उप महानिरीक्षक शिव प्रसाद चमोली को भारत सरकार के युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट श्रेणी में तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड जीवन पर्यत उपलब्धि के लिए चुना गया है। यह एक ऐसा पुरस्कार है जिसकी प्रतिष्ठा भारत के सर्वाेच्च खेल सम्मान अर्जुन अवॉर्ड के बराबर मानी जाती है। यह सम्मान एसपी चमोली के छह दशकों से अधिक के अथक योगदान को देश की सर्वाेच्च खेल उपलब्धियों में शामिल करता है। यह न केवल उनके लिए, बल्कि मसूरी, पूरे उत्तराखंड और हिमालयन एडवेंचर समुदाय के लिए गर्व की बात है। हिमालय की गोद में बीता जीवन व 1942 में जन्मे एसपी चमोली का एडवेंचर से जुड़ाव एक युवा सेना अधिकारी के रूप में शुरू हुआ और आईटीबीपी में उनके शानदार करियर के दौरान जारी रहा, जहाँ वे उप महानिरीक्षक के पद तक पहुँचे। छह दशकों से अधिक समय में, उन्होंने पर्वतारोहण, स्कीइंग और रिवर राफ्टिंग में कई राष्ट्रीय और विश्व रिकॉर्ड बनाए हैं। 1974 में सबसे मुश्किल और पहले कभी न चढ़ी गई नीलकंठ चोटी (21,640 फीट) पर पहली सफल चढ़ाई का नेतृत्व किया। 1978 भारत के पहले स्कीइंग अभियान के उप-नेता के तौर पर केदार डोम (22,710 फीट) पर चढ़ाई की, जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उनकी सराहना की; 1989 में इटली में हुए वर्ल्ड पुलिस विंटर गेम्स और यूरोपियन स्की चौंपियनशिप में भारत की पहली टीम की कप्तानी भी की। 1981 सर एडमंड हिलेरी की देखरेख में भारत-न्यूज़ीलैंड के संयुक्त हिमालयन ट्रैवर्स अभियान का नेतृत्व किया इसमें कंचनजंगा से काराकोरम तक पूरे हिमालय में 5,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की और 265 दिनों में 106 दर्रों को पार किया । यह आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है। 1986 काराकोरम की सबसे ऊंची बिना चढ़ी हुई चोटी, सासेर कांगरी-तीन 24,695 फ़ीट पर पहली बार चढ़ाई का नेतृत्व किया, और इसके बाद श्योक नदी में 105 किलोमीटर का अभूतपूर्व राफ्टिंग अभियान पूरा किया। संयुक्त भारत जापान ब्रहमपुत्र राफ्टिंग अभियान का नेतृत्व किया व त्सांगपो गॉर्ज और ब्रहमपुत्र नदी में गेलिंग से ध्र्रुबरी तक लगभग 1100 किमी प्रथम सफल राफ्टिंग जो आज भी विश्व रिकार्ड है। 1997 से भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन की राष्ट्रीय स्पोटर्स क्लाइंबिंग समिति के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में देशभर में स्पोटर्स क्लाइंबिग को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी एफ.आर.जी.एस. के फेलो तथा द ग्रेट हिमालयन ट्रैवर्स एवं राफ्टिंग डाउन द मिस्टिक ब्रह्मब्र पुत्र पुस्तकों के लेखक, जिनके अभियानों व लेखों को अमेरिकन अल्पाइन जर्नल, हिमालयन जर्नल तथा राष्ट्री मीडिया में वर्षों तक स्थान मिला। 84 वर्ष की आयु में भी एक सुरक्षित एवं साहसिक भारत के निर्माण में जुटे है। इस सम्मान की विशेषता यह है कि चमोली का साहसिक क्षेत्र में योगदान कभी थमा नहीं। आई.टी.बी.पी. से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने 1994 में केम्पटी फॉल, मसूरी मे हिमालयन एडवेंचर इंस्टीटयूट की स्थापना की और आज 84 वर्ष की आयु मे भी वे स्वयं भारत के भावी साहसिक कर्मियों एवं आपदा प्रतिक्रिया दलों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उनके प्रत्यक्ष नेतृत्व में, एचएआई आज भारत के अग्रणी आउटडोर शिक्षा एवं आपदा-सुसज्जता केंद्रों मे से एक बन चुका है। अभी तक 21,000 से अधिक युवाओं, और छात्रों एवं नागरिकों को पर्वतारोहण, रॉक व स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग, उच्च हिमालयी ट्रेकिंग तथा आउटडोर नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया गया है। उत्तराखंड पुलिस, एन.डी.आर.एफ., होम गार्ड, अग्निशमन सेवा एवं जिला प्रशासन से जुड़े 1,420 से अधिक खोज एवं बचाव कर्मियों को पर्वतीय बचाव व आपदा प्रबंधन मे ंप्रशिक्षित किया गया, जिनमें से अनेक ने बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाओं मे ंजीवन बचाने का कार्य किया। ओ.एन.जी.सी. तथा डिज़ास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर जैसी संस्थाओं के साथ एम्पैनल्ड, तथा हिमालयी पारिस्थितिकी, संस्कृति व विरासत संरक्षण के क्षेत्र मे योगदान हेतु संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है। आई.ए.एस. प्रोबेशनर्स, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, कॉर्पाेरेट टीमों तथा अंर्तराष्ट्रीय संस्थानों हेतु नेतृत्व, टीम निर्माण एवं संकट प्रबंधबं कार्यक्रमों का नियमित आयोजन कर रहे है। आज भी श्री चमोली संस्थान के प्रबंधन और स्वयं टीम बिल्डिंग, नेतृत्व, प्रेरणा एवं आपदा प्रबंधन के प्रशिक्षण सत्र संचालित करने में अपना समय देते है जो उनके सहयोगियों के अनुसार, साहस, सहनशक्ति और सेवा की उसी भावना का जीवंत उदाहरण है, जिसके सम्मान हेतु टेंज़िंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार की स्थापना की गई थी।उनका कहना है कि यह पुरुस्कार जितना मेरा है, उतना ही उत्तराखंड के पर्वतों और नदियों का भी है। मेरी एकमात्र अभिलाषा यही रही है कि हिमालय ने मुझे जो साहस, अनुशासन और सेवा की भावना सिखाई, उसे मैं अधिक से अधिक युवाओं तक पहुँचा सकूँ जब तक मुझ में सामर्थ्य है। 84 वर्ष की आयु में भी मेरा यही संकल्प है। 1994 मे एस.पी. चमोली द्वारा स्थापित, हिमालयन एडवेंचर इंस्टीट्यूट केम्पटी फॉल, मसूरी स्थित एक पंजीकृत गैर-सरकारी संस्था है, जो आउटडोर शिक्षा, पर्वतारोहण, स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग तथा आपदा प्रबंधबंन हेतु पर्वतीय खोज एवं बचाव प्रशिक्षण के लिए समर्पित है। तीन दशकों मे एचएआई ने हज़ारों युवा ओं, पुलिस व अर्धसैनिक कर्मियों, कॉर्पाेरेट टीमों एवं अंतरराष्ट्रीय अतिथियों को प्रशिक्षित किया है, तथा यह साहसिक-आधारित नेतृत्व एवं आपदा-सुसज्जता प्रशिक्षण के क्षेत्र में भारत के अग्रणी केंद्रों में गिना जाता है।

